ब्राह्मण कौन है? ब्राह्मणवाद क्या है? -01

ब्राह्मण कौन है? ब्राह्मणवाद क्या है? -01

को वा ब्राह्मणो नाम किं जीवः किं देहः किं जातिः किं ज्ञानं किं कर्म किं धार्मिक इति ?
ब्राह्मण कौन है? क्या वह जीव, देह, जाति, ज्ञान, कर्म अथवा कोई धार्मिकता (धार्मिक वाद है )?

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भारतीय परंपरा में “ब्राह्मण” कोई सत्ता-संरचना नहीं, बल्कि चेतना का स्तर है। ब्रह्म जानाति इति ब्राह्मणः—जो ब्रह्म को जानने की साधना में प्रवृत्त है, वही ब्राह्मण है।

यह तत्त्व कर्म, गुण और आचरण पर आधारित है, बहुत हद तक जन्म पर भी ।

वेद, उपनिषद, पुराण—किसी भी प्राचीन प्रामाणिक शास्त्र में ब्राह्मणों द्वारा किसी जाति विशेष पर संस्थागत अत्याचार का कोई प्रमाण नहीं मिलता। 

जो उदहारण प्रस्तुत किये जाते है वह मुगलकालीन देन हैं और Mills/Macaulay जैसों की रचना History of British India की आधुनिक देन हैं ! जिसे कालांतर में हबीबों, थापरों , झा जी जैसे इतिहासकारों द्वारा तथाकथित मार्क्सवाद और तथाकथित अम्बेडकरवादी दलितवाद के चश्मे से भारतीयों को परोसा गया है l उसी को आज फिर से क्षुद्र और स्वार्थी राजनैतिक लाभों के चलते प्रोत्साहित भी किया जा रहा है  l 

जबकि इसके विपरीत, ज्ञान, संयम, त्याग और लोकमंगल ही ब्राह्मण का धर्म बताया गया है—चाहे वह ऋग्वेद हो या उपनिषद।

मनुस्मृति को आज जिस प्रकार केवल “शूद्र-विरोधी ग्रंथ” के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वह बौद्धिक बेईमानी का उदाहरण है। वस्तुतः मनुस्मृति में ब्राह्मणों के लिए भी अत्यंत कठोर दंड-विधान निर्धारित हैं—विशेषतः तब, जब वे अपने आचरण से गिरते हैं।

मनु के अनुसार, ब्राह्मण यदि ज्ञान और चरित्र से च्युत हो, तो उसका पतन सबसे गंभीर माना गया है। अतः मनुस्मृति को केवल कुछ श्लोकों के आधार पर, आधुनिक राजनीतिक एजेंडे के अनुरूप प्रस्तुत करना, ग्रंथ नहीं—ग्रंथ-विरोधी राजनीति है।

भारत का राष्ट्रीय चरित्र संघर्ष नहीं, समन्वय पर आधारित है। यहाँ ज्ञान (ब्राह्मण), शक्ति (क्षत्रिय), उत्पादन (वैश्य) और सेवा (शूद्र)—चारों सामाजिक कार्य एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।

जो भी विचारधारा जाति, पंथ, भाषा या क्षेत्र के नाम पर भारतीयों को आपस में बाँटती है—वह चाहे वाम हो या दक्षिण—वह राष्ट्रविरोधी है।

और जो ब्राह्मण-तत्त्व को नष्ट करने की बात करता है, वह वस्तुतः भारत की ज्ञानात्मक रीढ़ को तोड़ने का प्रयास करता है।

“ब्राह्मणवाद” कोई दमनकारी वाद नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक चेतना का नाम है। इसे मार्क्सवादी चश्मे से देखना वैसा ही है, जैसे उपनिषदों को मैनुअल की तरह पढ़ना।

को वा ब्राह्मणो नाम किं जीवः किं देहः किं जातिः किं ज्ञानं किं कर्म किं धार्मिक इति ?

ब्राह्मण कौन है? क्या वह जीव, देह, जाति, ज्ञान, कर्म अथवा कोई धार्मिकता (धार्मिक वाद है )?

तर्हि को वा ब्राह्मणो नाम ! यः कश्चिदात्मानमद्वितीयं जातिगुणक्रियाहीनं षडूर्मीषडभावेत्यादिसर्वदोषरहितं   सत्यज्ञानानन्दानन्तस्वरूपं स्वयं निर्विकल्पमशेषकल्पाधारमशेषभूतान्तर्यामित्वेन वर्तमानमन्तर्बहीश्चाकाशवदनुस्यूतमखंडानन्द स्वभावमप्रमेयमनुभवैकवेद्यमापरोक्षतया भासमानं करतलामलकवत्साक्षादपरोक्षीकृत्य कृतार्थतया कामरागादिदोषरहितः शमदमादिसम्पन्नो भावमात्सर्यतृष्णाशामोहादिरहितो दंभाहंकारादिभिरसंस्पृष्टचेता वर्तत एवमुक्तलक्षणो यः स एव ब्राह्मण इति श्रुतिस्मृतिपुराणेतिहासानामभिप्रायः ! अन्यथा हि ब्राह्मणत्वसिद्धिर्नासत्येव ! सच्चिदानंदमात्मानमद्वितीयं ब्रह्म भावयेदात्मानं सच्चिदानंद ब्रह्म भावयेदि त्युपनिषत !!९!! 

 तब ब्राह्मण किसे माना जाये ? 

इसका उत्तर देते हुए उपनिषत्कार कहते हैं – 

जो आत्मा के द्वैत भाव से युक्त ना हो; जाति गुण और क्रिया से भी युक्त न हो; 

षड उर्मियों और षड भावों आदि समस्त दोषों से मुक्त हो; सत्य, ज्ञान, आनंद स्वरुप, स्वयं निर्विकल्प स्थिति में रहने वाला, अशेष कल्पों का आधार रूप , समस्त प्राणियों के अंतस में निवास करने वाला , अन्दर-बाहर आकाशवत संव्याप्त ; अखंड आनंद्वान , अप्रमेय, अनुभवगम्य , अप्रत्येक्ष भासित होने वाले आत्मा का करतल आमलकवत परोक्ष का भी साक्षात्कार करने वाला; 

काम-रागद्वेष आदि दोषों से रहित होकर कृतार्थ हो जाने वाला ; शम-दम आदि से संपन्न ; मात्सर्य , तृष्णा , आशा,मोह आदि भावों से रहित; दंभ, अहंकार आदि दोषों से चित्त को सर्वथा अलग रखने वाला हो, 

वही ब्राह्मण है; ऐसा श्रुति, स्मृति-पूरण और इतिहास का अभिप्राय है !

इस (अभिप्राय) के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार से ब्राह्मणत्व सिद्ध नहीं हो सकता l आत्मा सत्-चित् और आनंद स्वरुप तथा अद्वितीय हैl इस प्रकार ब्रह्मभाव से संपन्न मनुष्यों को ही ब्राह्मण माना जा सकता हैl यही उपनिषद का मत है l

तो आज आवश्यकता है:

न ब्राह्मणवाद से आज़ादी की,
न ब्राह्मणवाद के नाम पर उन्माद की,
बल्कि मूल ब्राह्मण-तत्त्व की पुनर्स्थापना की
जो ज्ञान, विवेक, आत्मसंयम और राष्ट्रीय एकता का आधार रहा है।

यही भारत का स्वभाव है।
यही भारत का भविष्य भी।

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