अथर्ववेद-संहिता – 1:23 – श्वेत कुष्ठ नाशन सूक्त

अथर्ववेद-संहिता
॥अथ प्रथमं काण्डम्॥

[२३- श्वेत कुष्ठ नाशन सूक्त]

[ ऋषि – अथर्वा। देवता- असिक्नी वनस्पति। छन्द- अनुष्टुप्।]

९९. नक्तंजातास्योषधे रामे कृष्णे असिक्नि च।
इदं रजनि रजय किलासं पलितं च यत्॥१॥

हे रामा-कृष्णा तथा असिक्नी ओषधियो! आप सब रात्रि में पैदा हुई हैं। रंग प्रदान करने वाली हे ओषधियो! आप गलित कुष्ठ तथा श्वेतकुष्ठग्रस्त व्यक्ति को रंग प्रदान करें ॥१॥

[धन्वन्तरिके अनुसार रामा से रामा तुलसी, आरामशीलता, घृतकुमारी, लक्षणा आदि कृष्णासे कृष्णा तुलसी, कृष्णामूली, पुनर्नवा, पिप्पली आदि तथा असिक्नी से असिकनी असिशिप्वी आदि का बोध होता है।]

१००. किलासं च पलितं च निरितो नाशया पृषत्।
आ त्वा स्वो विशतां वर्णः परा शुक्लानि पातय॥२॥

हे ओषधियो ! आप कुष्ठ, श्वेतकुष्ठ तथा धब्बे आदि को विनष्ट करे, जिससे इस व्याधिग्रस्त मनुष्य के शरीर में पूर्व जैसी लालिमा प्रवेश करे। आप सफेद दाग को दूर करके इस रोगी को अपना रंग प्रदान करें॥२॥

१०१. असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव।
असिक्न्यस्योषधे निरितो नाशया पृषत्॥३॥

हे नील ओषधे ! आपके पैदा होने का स्थान कृष्ण वर्ण है तथा जिस पात्र में आप स्थित रहती है, वह भी काला है । हे ओषधे ! आप स्वयं श्याम वर्ण वाली हैं, इसलिए लेपन आदि के द्वारा इस रोगी के काल आदि धब्बों को नष्ट कर दें ॥३॥

१०२. अस्थिजस्य किलासस्य तनजस्य च यत् त्वचि।
दूष्या कृतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतमनीनशम्॥४॥

शरीर में विद्यमान अस्थि और त्वचा के मध्य के मांस में तथा त्वचा पर जो श्वेत कुष्ठ का निशान है, उसे हमने ब्रह्म (ज्ञान या मन्त्र) प्रयोग के द्वारा विनष्ट कर दिया ॥४॥

भाष्यकार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य

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