अथर्ववेद संहिता
अथ चतुर्थ काण्डम्
[२५ – पापमोचन सूक्त]
[ ऋषि – मृगार। देवता – वायु, सविता। छन्द – त्रिष्टुप्, ३ अतिशक्वरीगर्भा जगती, ७ पथ्याबृहती।]
७८८. वायोः सवितुर्विदथानि मन्महे यावात्मन्वद् विशथो यौ च रक्षथः।
यौ विश्वस्य परिभू बभूवथुस्तौ नो मुञ्चतमंहसः॥१॥
वायु और सूर्य के श्रुतिविहित कर्मों को हम जानते हैं। हे वायुदेव ! हे सवितादेव ! आप आत्मा वाले स्थावर तथा जंगम प्राणियों में विद्यमान रहकर संसार की सुरक्षा करते हैं तथा उसे धारण करते हैं। अत: आप हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥१॥
७८९. ययोः सङ्ख्याता वरिमा पार्थिवानि याभ्यां रजो युपितमन्तरिक्षे।
ययोः प्रायं नान्वानशे कश्चन तौ नो मुञ्चतमंहसः॥२॥
जिन दोनों (वायु तथा सविता) के पार्थिव कर्म मनुष्यों में विख्यात हैं। जिनके द्वारा अन्तरिक्ष में मेघ-मण्डल धारण किया जाता है तथा जिनकी गति को कोई भी देवता नहीं प्राप्त कर सकता, वे हमें समस्त पापों से मुक्त करें॥२॥
७९०. तव व्रते नि विशन्ते जनासस्त्वय्युदिते प्रेरते चित्रभानो।
युवं वायो सविता च भुवनानि रक्षथस्तौ नो मुञ्चतमंहसः॥३॥
हे चित्रभानु (विचित्र प्रकाश वाले-सूर्यदेव) ! आपकी सेवा करने के लिए मनुष्य नियमपूर्वक व्यवहार करते हैं और आपके उदित होने पर समस्त लोग अपने कर्म में प्रवृत्त हो जाते हैं। हे वायुदेव तथा सवितादेव ! आप दोनों समस्त प्राणियों की सुरक्षा करते हैं। अत: समस्त पापों से हमें मुक्त कराएँ॥३॥
७९१. अपेतो वायो सविता च दुष्कृतमप रक्षांसि शिमिदां च सेधतम्।
सं ह्यू३र्जया सृजथः सं बलेन तौ नो मुञ्चतमंहसः॥४॥
हे वायु एवं सूर्यदेव ! आप हमारे दुष्कृत्यों को हमसे पृथक् करें और उपद्रव करने वाले राक्षसों तथा प्रदीप्त (प्रखर) कृत्या को हमसे दूर करें। आप अन्न-रस से उत्पन्न बल से हमें युक्त करें तथा समस्त पापों से छुड़ाएँ ॥४॥
७९२. रयिं मे पोषं सवितोत वायुस्तनू दक्षमा सुवतां सुशेवम्।
अयक्षमतातिं मह इह धत्तं तौ नो मुञ्चतमंहसः॥५॥
वायुदेव तथा सूर्यदेव हमें ऐश्वर्य प्रदान करें और हमारे देह में सुख-सामर्थ्य का संचार करें। हे वायुदेव तथा सवितादेव ! आप हममें आरोग्यता धारण करें तथा समस्त पापों से मुक्त करें॥५॥
७९३. प्र सुमतिं सवितर्वाय ऊतये महस्वन्तं मत्सरं मादयाथः।
अर्वाग् वामस्य प्रवतो नि यच्छतं तौ नो मुञ्चतमंहसः॥६॥
हे सूर्यदेव ! हे वायुदेव ! आप सुरक्षा के निमित्त हमें श्रेष्ठ बुद्धि प्रदान करें और हर्षकारी सोमरस पीकर आनन्दित हों। आप हमें सेवन करने योग्य प्रचुर धन प्रदान करें तथा समस्त पापों से मुक्त करें॥६॥
७९४. उप श्रेष्ठा न आशिषो देवयोर्धामन्नस्थिरन्।
स्तौमि देवं सवितारं च वायुं तौ नो मुञ्चतमहसः॥७॥
वायुदेव और सूर्यदेव के सम्मुख हमारी श्रेष्ठ आकांक्षाएँ उपस्थित हैं। हम उन दोनों देवों की प्रार्थना करते हैं, वे समस्त पापों से हमें मुक्त करें ॥७॥
– वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
